रेगिस्तान में नहरें बनाऊँ
मोड़ दूं धारा नदी का
रोप दूँ कुछ पौध नन्हे
धरती के उस गोद में
मालूम है कुछ सुखेंगे
फिर भी कुछ तो बचेंगे,ऐसे
धीरे धीरे हरियाली सजेगी
बंजर घाव कि लाली भरेगी
तब धूप का रंग भी प्यारा
छाँव के संग संग चलेगा
प्रकृति से रिश्ता मनोरम
रेत कि उसी जहाँ में
हवा मीठा मीठा बहेगा
चाँद का थिरके उजाला
प्रेम की कलियाँ खिलेगी
जीवन में खुशियाँ मिलेगी.
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